HomeLibrarySaravaliCh.53Verse 1
Sārāvalī
Chapter 53 · Manifold Births · (chapter 53) · Verse 1
Sanskrit · DevanāgarīSārāvalī manuscript tradition
त्रिपञ्चाशो 5ध्यायः ।
वियोनि जन्माघ्याय का कथन
देवविदां "प्रीतिकरं विश्वसनीयं समस्तलोकस्य ।
कनकाचार्यस्थ मताद्वियोनिसंज्ञं प्रवक्ष्यामि
Translations
English

In order to evaluate the auspicious and inauspicious effects in day-to-day life due to planetary transits, Yavanacharyas have explained AshtakaVarga (which are detailed below).

Hindi

तेरह तिरछी रेखा व ९ खड़ी रेखा खींच कर इसके अतिरिक्‍त एक खड़ी रेखा व एक तिरछी रेखा खींचने पर ११७ कोष्ठ का चक्र बनता है । ग्रन्थकार ने 'तदूष्वं? १. पञ्चमदशमाष्टराक्षि । कहकर सिद्ध किया है कि १४ तिरछी व १० खड़ी रेखा खींचने पर ही ११७ कोष्ट का चक्र बनता है + कि १३ तिरछी व ९ खड़ी रेखाओं से ११७ कोष्ठ का चक्र बन सकता है । इन १३ व ९ खड़ो रेखाओं से तो ९६ कोष्ठ का चक्र सिद्ध होता है । इस ११७ कोष्ठक के चक्र में प्रथम एक कोष्ठक का त्याग करके बायीं ओर से प्रथम पंक्ति में १२ राशियों को ग्रहां के साथ लिखना चाहिये । तथा प्रथम एक कोष्ठक को छोड़ कर ऊर्घ्वं प्रथम पंक्ति में सूर्यादि सात ग्रह व लग्न को लिखना चाहिये । पुनः अपने- अपने अष्टक वर्ग में समागत द्वादश राशियों में शुभ अशुभ बिन्दु व रेखाओं को लिखता चाहिये

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