HomeLibraryPhaladeepikaCh.1Verse 13
Phaladeepika
Chapter 1 · rāśi bheda · राशि भेद · Verse 13
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
ऋणास्त्रचोरक्षतरोगशत्रून् ज्ञात्याजिदुष्कृत्याघभीत्यवज्ञाः ।
जामित्रचित्तोत्थमदास्तकामान् द्यूनाध्वलोकान् पतिमार्गभार्याः
IAST Transliteration
ṛṇāstracorakṣatarogaśatrūn jñātyājiduṣkṛtyāghabhītyavajñāḥ | jāmitracittotthamadāstakāmān dyūnādhvalokān patimārgabhāryāḥ
TranslationsTwo-source verified
English

Rina (debt), Astra (arms), Chora (thief), Kshata (wounds), Roga (disease), Satru (enemy), Jnati (paternal relation), Aji (battle), Dushkritya (a wicked act), Agha (sin), Bheeti (fear) and Avajna (humiliation) are the names of the 6th house. Jamitra, Chittottha, Mada (passion), Asta (set), Kama (desire), Dyuna, Adhvan (a way or road), Loka (people), Pati (husband), Marga (way) and Bharya (wife) are the designations of the 7th house.

Hindi

जन्मकुंडली में १२ भाव होते हैं। एक-एक भाव को अनेक नाम से पुकारते हैं। किस-किस भाव के कितने और क्या-क्या नाम हैं, यह नीचे बताया जाता है। इसका प्रयोजन यह है कि एक ही भाव के भिन्न-भिन्न नामों से यह पता चलता है कि उस एक ही भाव से किन-किन भिन्न-भिन्न चीज़ों का विचार करना। (१) लग्न, होरा, कल्य (प्रभात, सूर्योदय अर्थात् प्रारम्भ), देह, उदय (प्रारम्भ होना), रूप, सिर, वर्तमान काल (मौजूदा हालत), जन्म — इन सब का विचार पहले घर (भाव) से करें। (२) धन, विद्या, अपनी वस्तु (धन पर अधिकार), खाना पीना, भोजन, दाहिना नेत्र, चेहरा, पत्रिका (चिट्ठी), वाणी (बोलने की शक्ति), कुटुम्ब — यह द्वितीय घर के नाम हैं अर्थात् इन सब का विचार द्वितीय भाव से करें। (३) दुश्चिक्य, छाती, दाहिना कान, सेना, हिम्मत, वीरता, शक्ति तथा भाई (बहिनों) का विचार तृतीय से करें। इसको दुश्चिक्य स्थान भी कहते हैं। (४) घर, खेत, मामा, भाञ्जा, बन्धु, मित्र, सवारी, माँ, गाय-भैंस, सुगन्धि, वस्त्र, जेवर, तथा सुख का विचार चौथे घर से करें। इसी घर से पानी, नदी, पुल, आदि का विचार करना चाहिये। चौथे घर को 'हिबुक' भी कहते हैं। (५) राजशासन की मोहर, मंत्री, कर (टैक्स), आत्मा, धी, भविष्य ज्ञान, प्राण, सन्तान, पेट, श्रुति (वेद) स्मृति (मनुस्मृति आदि) का विचार पंचम से करें। श्रुति-स्मृति से तात्पर्य है शास्त्र ज्ञान का। अतः समस्त शास्त्र ज्ञान का विचार पंचम स्थान से करना चाहिये। (६) कर्ज़ा, अस्त्र, चोर, घाव (चोट), रोग, शत्रु, जाति (भाई बन्धु जो शत्रुता का भाव रखते हों), युद्ध, दुष्ट कर्म, पाप, भय, अपमान आदि का विचार छठे घर से करें। (७) हृदय की इच्छाएँ (काम वासना), मद, मार्ग, लोक (जनता), पति, पत्नी आदि का विचार सप्तम भाव से करना चाहिये। इस सातवें स्थान को द्यून तथा जामित्र भी कहते हैं। सूर्य अस्त के समय, पूर्व क्षितिज लग्न राशि से सातवें घर में रहता है इस कारण सप्तम स्थान की अस्त संज्ञा भी है। (८) मांगल्य (स्त्री का सौभाग्य — पति का जीवित रहना), रन्ध्र (छिद्र), आधि (मानसिक बीमारी-चिन्ता), अपमान या हार, आयु (कितने वर्ष मनुष्य ज़िन्दा रहेगा), क्लेश, बदनामी, मृत्यु, विघ्न, अशुचि (अपवित्रता या मरने के कारण सूतक), दास (गुलामों) का विचार अष्टम स्थान से करना चाहिये। गुदा का विचार भी अष्टम से किया जाता है। अष्टम में मंगल प्रायः बवासीर का रोग करता है। (९) आचार्य (गुरु), देवता (आराध्य देव), पिता, पूजा, पूर्व भाग्य (तप, सत्कर्म), पौत्र, उत्तम वंश आदि का विचार नवम भाव से करना चाहिये। इस को शुभ स्थान भी कहते हैं। दक्षिण भारत में नवें घर से पिता का विचार किया जाता है किन्तु उत्तर भारत में दसवें घर से पिता का विचार करते हैं। (१०) व्यापार, उच्च स्थान (पोज़ीशन), इज़्ज़त, कर्म, जय, यश, यज्ञ, जीविका का उपाय, कार्य में अभिरुचि, आचार (सदाचार या दुराचार), गमन, हुकूमत, गुण, आकाश आदि का विचार दसवें घर से करें। इसे 'मेषूरण' या आज्ञा स्थान भी कहते हैं। (११) लाभ, आमदनी, प्राप्ति, आगमन, सिद्धि, वैभव (धन, ऐश्वर्य), कल्याण, श्लाध्यता-प्रशंसा, बड़ा भाई या बड़ी बहन, बायाँ कान, सरसता, अच्छी खबर आदि का विचार ग्यारहवें घर से करें। (१२) दुःख, पैर, बायाँ नेत्र, ह्रास, चुगलखोर, अन्त (किसी का आख़िरी परिणाम), दरिद्रता, पाप, शयन (पलंग पर शयन करना — इसके अतिरिक्त पुरुष-स्त्री गुप्त सम्बन्ध भी समझना चाहिये), खर्चा, बन्धन (जेल जाना) आदि का विचार बारहवें स्थान से करें। बारहवें घर को व्यय स्थान या 'रिफ' भी कहते हैं। तीसरे, छठे, आठवें तथा बारहवें घर को 'लीन' स्थान कहते हैं। लीन का अर्थ है छिपा हुआ। आठवाँ सब से निकृष्ट समझा जाता है। छठे, ८वें तथा १२वें स्थान को 'त्रिक' भी कहते हैं।

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