HomeLibraryPhaladeepikaCh.26Verse 9
Phaladeepika
Chapter 26 · gocaraphala · गोचरफल · Verse 9
Sanskrit · DevanāgarīPhaladeepika manuscript tradition
जन्मन्यायासदाता क्षपयति विभवान् क्रोधरोगाध्वदाता
वित्तभ्रंशं द्वितीये दिशति न सुखदो पञ्चनामाग्रहं च ।
स्थानप्राप्तिं तृतीये धननिचयमुदाकल्यकृच्चारिहन्ता
रोगाण् दत्ते चतुर्थे जनयति च मुहुः स्रग्धराभोगविघ्नम्
IAST Transliteration
janmanyāyāsadātā kṣapayati vibhavān krodharogādhvadātā vittabhraṃśaṃ dvitīye diśati na sukhado pañcanāmāgrahaṃ ca | sthānaprāptiṃ tṛtīye dhananicayamudākalyakṛccārihantā rogāṇ datte caturthe janayati ca muhuḥ sragdharābhogavighnam
TranslationsTwo-source verified
English

When the Sun traverses through the Rasi occupied by the Moon, the person concerned will suffer fatigue and loss of wealth. He will become irritated and suffer from diseases. He will undertake a wearisome journey. When he transits the 2nd house, there will be loss of wealth; and the person will be unhappy. He will be duped by others, and will be obstinate. In the 3rd house, acquisition of a new position, advent of moneys, happiness, freedom from sickness and destruction of enemies will be the result. In the 4th house, the Sun will cause diseases; and there will often arise impediments to the native in the matter of his sexual enjoyments.

Hindi

अब सूर्य जन्म-राशि से गिनने पर — गोचरवश प्रत्येक स्थान में क्या-क्या फल उत्पन्न करता है — यह बताते हैं। उदाहरण के लिये जन्म-कुण्डली में वृष राशि में चन्द्रमा है तो सूर्य जब वृष राशि में होगा तो प्रथम स्थान में हुआ; मिथुन में जब सूर्य हुआ तो द्वितीय सूर्य हुआ — इस प्रकार प्रथम, द्वितीय आदि गिनना चाहिये। (१) परिश्रम कराता है, धन खर्च होता है, जातक क्रोध करता है (मन के प्रतिकूल परिस्थिति होने से क्रोध होता है), यात्रा कराता है या यात्रा नहीं हुई तो जिस स्थान में मनुष्य रहता है वहीं बहुत चलाता है। (२) धन का नाश, सुख नहीं होता, मनुष्य ज़िद्दी हो जाता है, लोग उसको धोखा देकर उससे काम निकालते हैं। (३) स्थान-प्राप्ति, धन-संग्रह से हर्ष, शुभ समाचार प्राप्त हों या शुभ कार्य करे, शत्रुओं का नाश हो — उन पर विजय प्राप्त हो। (४) रोग उत्पन्न हो, सुख के कार्यों में बाधा हो। (५) मन में क्षोभ हो, रोग-मोह आदि के कारण मानसिक विकलता। (६) रोगों का नाश हो, शत्रुओं पर विजय हो, शोक-मोह आदि विकलता उत्पन्न करने वाले भावों का नाश हो — अर्थात् चित्त स्वस्थ रहे। (७) रास्ता चलना पड़े, पेट में या गुदा में (बवासीर आदि) पीड़ा हो, मनुष्य को दीनता-हीनता अर्थात् सम्मान-हानि, आदर की कमी के कारण मन में क्लेश का अनुभव हो। (८) रोग, भय उत्पन्न करे, मन में ताप (चिन्ता), कलह (लड़ाई, झगड़ा, विवाद), राजा या सरकार-अधिकारी वर्ग से भय — उनकी नाराज़गी का अन्देशा हो। (९) आपत्ति, दीनता, अपने प्रिय लोगों से विरह, जो उद्योग किये जावें उनमें असफलता। (१०) जिस कार्य की सिद्धि के लिये काम कर रहे हों उसमें सफलता — कोई बड़ा कार्य उठाया गया हो तो वह पूरा हो। (११) स्थान-प्राप्ति, सम्मान-वृद्धि, द्रव्य-लाभ, रोग से छुटकारा, आर्थिक-शारीरिक स्वास्थ्य। (१२) क्लेश, धन की बर्बादी, ज्वर आदि रोग, दोस्त दुश्मनी करे।

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