In his passage through the 9th house, Saturn will bring about loss in finance. There will be many obstacles for the native's doing any good action. A relative who is equal to the father will die. There will be perpetual sorrow. In his transit through the 10th house, Saturn will make the native do a sinful deed. There will be loss of honour. The person may suffer from disease. Saturn in the 11th house confers all kinds of happiness and wealth on the native, who will also receive unique honour. When Saturn is in the 12th house, the native will be wearied by being engaged in a worthless and fruitless business. He will be robbed of his moneys by his enemies. His wife and sons will suffer from sickness.
जब जन्मकालीन चन्द्र-राशि में ही गोचर से शनि भ्रमण कर रहे हों तो रोग, किसी की मृत्यु के कारण आशौच आदि अशुभ फल होते हैं। जन्म-राशि से द्वितीय में शनि हो तो सन्तान-कष्ट, धन-नाश आदि अशुभ फल। तृतीय शनि हो तो स्थान-लाभ (नयी जगह या नौकरी की प्राप्ति) या रोज़गार, अपनी हुकूमत, बहुत से नौकरों का होना, धन-लाभ आदि शुभ फल। चौथे शनि अशुभ फल-कारक है — धन-नाश, स्त्री-नाश (या स्त्री से कलह), बन्धुओं से या उनके कारण कष्ट आदि। पंचम शनि हो तो धन की कमी हो या घाटा लगे, सन्तान-कष्ट, बुद्धि-नाश (मन में शान्ति न रहे, नाना प्रकार की चिन्ताओं तथा उद्वेगों से अशान्ति रहे)। षष्ठ शनि शुभ फल देता है — सब प्रकार का सुख, शत्रुओं पर विजय आदि शुभ फल। सप्तम शनि पीड़ाकारक होता है — स्त्री-कष्ट (स्त्री को रोग या उससे कलह), अनेक प्रकार का भय, व्यर्थ की कष्टप्रद यात्रायें आदि। अष्टम शनि भी पूर्ण अशुभ फल देता है — सन्तान-नाश या कष्ट, पशु-मित्र-धन आदि के कारण घोर पीड़ा; मित्र नष्ट हो जायें, पशु मर जायें, धन की विशेष हानि हो, स्वास्थ्य-सम्बन्धी चिन्ता उपस्थित हो, किसी पीड़ा-कारक रोग के कारण विशेष शरीर-कष्ट हो। नवें शनि दरिद्रता-कारक होता है — धर्म-कार्य में विघ्न उपस्थित हों, पिता के समान किसी श्रेष्ठ व्यक्ति की (गुरु, चाचा, मामा आदि की) मृत्यु हो और कुछ-न-कुछ दुःख का कारण बना रहे। दशम शनि हो तो सम्मान-भंग (इज़्ज़त में बट्टा लगे), कोई विशेष पीड़ा-कारक रोग हो, और किसी ऐसे व्यापार में प्रवृत्ति हो जिसमें असफलता हो और घाटा लगे या ऐसा दुष्ट कर्म बन आये जिसके कारण अप्रतिष्ठा हो। एकादश-स्थान में जब शनि भ्रमण करे तो शुभ-फल-कारक होता है — सब प्रकार के सुख, बहुत प्रकार के वैभव, उत्कृष्ट कीर्ति आदि शुभ फल। बारहवें शनि हो तो व्यर्थ कार्यों में लगे रहने के कारण व्यर्थ का परिश्रम होता है — अर्थात् उद्योग-सिद्धि या सफलता न मिलने के कारण केवल कष्ट-प्राप्ति होती है; शत्रुओं द्वारा धन-नाश, स्त्री और पुत्रों को रोग-पीड़ा होती है।
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