Muhūrta Cintāmaṇi
Chapter 11 · · Verse 2
Sanskrit · DevanāgarīMuhūrta Cintāmaṇi manuscript tradition
Translations
Hindi

क्‍ अन्वयः--प्रविदितजन्मनां | नृपाणां यात्रायां दिवस दांतव्यम्‌ । अबुद्धजन्मनां नृपाणां च प्रश्नाद्रं: उदयनिमित्तमूलभूतः अशुभशुभे विज्ञाते बुध: यात्रायां दिवसं | प्रद्यात ।। १ ॥ | किसी कार्य की सिद्धि के लिए अन्य देशझ्यादि में जाने का नाम यात्रा है । वह कार्यभेद से दो प्रकार की होती है ।एक वह जो कि आगे कहे हुए योग, लग्न और जन्मकुण्डली में राजयोग, शुभलग्न के रहते होती है, यथा द क् द समरयात्रा । और दूसरी वह जो कि साधारण पंचांगादि की शुद्धि रहते होती है । यथा द्रव्यादि के कमाने या तीर्थादि करने के लिए साधारण यात्रा । इन दोनों केविशेष विचार करने -की इच्छा से पहिले उसके अधिकारी को कहते हैं । क्‍ यात्राप्रकरण १६०५ पण्डितों को चाहिए कि जिनके जन्मकालिक शुभाशुभ राजयोगादि जाने गये हों उन राजाओं को, और जिनका जन्मकाल न जाना गया हो, प्रन्‍नकालिक लग्न वा शकुनादि द्वारा उनके शुभाशुभ राजयोगादि को जानकर उन राजाओं को भी यदि बताने के योग्य हो तो यात्रा करने के योग्य दिन बतावे । यहाँ राजाओं के सिवा साधारण अन्य मनुष्य भी ग्रहण किये जाते हैं; क्योंकि यात्रा केबिना किसी का काम नहीं चल सकता इसलिए राजा से लेकर साधारण मनुष्य तक सब यात्रा करने के अधिकारी हैं ।। १ ॥। प्रन्‍्नकालिक शुभ यात्रायोग जननराशितन्‌ यदि लग्नगे तदधिपौ यदि वा तत एवं वा ज्रिरिपुखायगुहूं यदि वबोदये विजय एवं भवेद्वसुधापतेः ॥ २॥।

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