सूर्यो रसान्त्ये खयुगेडग्निनन्दे शिवाक्षयोर्भामशनी तसवच । ला गुणान्त्ये चन्द्रो5म्बराब्धो गुणनन्दयोइच ॥ १॥। रसाडूप्योर्भशरे अन्वयः--स्वजन्म राशे: सूर्य: रसान्त्ये, खयूगे, अग्निनन्दे, शिवाक्षयो: । च (तथा ) भौमशनी (तथा) तमः रसाद्भूयोः, लाभशरे, गुणान्त्ये ।च (तथा) चन्द्र: अम्बराब्धो, ग्णनन्दयो:, लाभाष्टमे, अआद्यशरे, रसान््त्ये, नगद्वये ॥ १ ॥। सूर्यादि ग्रह छठे बारहवें आदि स्थानों में क्रम सेशुभ और विद्ध होते हैंअर्थात् जन्मराशि से छठी राशि में स्थित सूर्य शुभ और यदि जन्म राशि से बारहवें स्थान में शनेशचर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही दशवें स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि चौथे स्थान में शनेश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध अर्थात् शुभ भी अशुभ हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में स्थित सूर्य शुभ और यदि नवें स्थान में शनेइचर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो सूर्य विद्ध हो जाता है। ऐसे ही गेरहवें स्थान में स्थित सूयं शुभ और यदि पाँचवें स्थान में शनेश्चर को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो बिद्ध हो जाता है। मंगल, शनेइचर, राहु, केतु ये ग्रह जन्मराशि से छठे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। गेरहवें स्थान में शुभ और यदि पाँचवें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। तीसरे स्थान में शुभ और यदि बारह॒वें स्थान में कोई ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाते हैं। परन्तु दनेश्चर भी सूर्य से विद्ध नहीं होता; क्योंकि आगे कहा है कि गोचर में पिता पुत्र का वेध नहीं होता । जन्मराशि से ददावें स्थान में स्थित चन्द्रमा शुभ और यदि चौथे स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है। ऐसे ही तीसरे स्थान में शुभ और यदि नवें स्थान में बुध को छोड़ अन्य ग्रह स्थित हों तो विद्ध हो जाता है ॥ १ ॥
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