There will be danger of premature death, if Saturn be the lord of the 2nd or the 7th. Lord Shiva will afford protection and render relief if Mrityunjaya Japa is performed in the prescribed manner.
तथाष्टमे व्यये मन्दे नीचे वा पापसंयुते । तदभुक्त्यादौ राजभीतिर्विषशस्त्रादिपीडनम् ।।4।। रक्तस्नावो गुल्मरोगो ्यतिसारादिपीडनम् । मध्ये चौरादि भीतिश्च. देशत्यागो मनोरुजः ।।5।। अन्ते शुभकरी चैव शनेरन्तर्दशा द्विज ! । दितीयद्यूननाथे तु हयपमूृत्युर्भविष्यति ।।6।। दोषस्य परिहारार्थं मृत्युंजयमनुं जपेत् । तस्माच्छान्तिमवाप्नोति शंकरस्य प्रसादतः ।।7।। यदि शनि 8.12 मे या नीचगत या पापयुक्त हो तो अन्तर्दशारम्म मे राज भय, विषशस्त्रादि पीडा, रक्त बहना, गुल्म (पथरी, अन्दरूनी फोड़ या जिगर बढ़ना, दस्त आदि होते है। दशा मध्य में चोर भय, स्थान यादेश का त्याग, मनोविकार होते है । अन्त मेँ शनि में शनि की अन्तर्दशा शुम फल देती है। यदि शनि 2.7 भावेश हो तो अपमृत्यु से बचने के लिए मृत्युंजय मन्त्र का जप करने से अनिष्ट निवारण होता है।
Ask the VedicPupil AI — trained on the complete classical corpus.