If Dhvaja is in the 8th, the native will be interested in base acts, be sinful, shameless, will blame others, will lack in marital happiness and will take others' side.
उपकेतु (शिखि/ध्वज) का द्वादशभाव-फल: (1) लग्न में उपकेतु हो तो सब विद्याओं में कुशल, सुखी, वाक्-चतुर, प्रिय, सब इच्छा पूर्ण होने का योग पाता है। (2) द्वितीयस्थ उपकेतु से अच्छा-वक्ता, प्रिय-भाषी, सुन्दर, काव्य-कर्ता, पण्डित, अभिमानी, विनीत, वाहन-सुख से युक्त होता है। (3) तृतीयस्थ उपकेतु से बहुत छोटे-हृदय वाला अर्थात् स्वार्थी व कंजूस, क्रूरता-पूर्ण व्यवहार करने वाला, पतले-शरीर वाला, धन-रहित, तीव्र-रोग से पीडित होता है। (4) चतुर्थस्थ उपकेतु हो तो रूपवान्, गुण-सम्पन्न, सात्त्विक, वेदों से प्रेम करने वाला, सदा सुखी होता है। (5) पञ्चमस्थ उपकेतु से सुखी, भोगवान्, कला-विद्, युक्ति-पूर्वक कार्य-साधन करने वाला, बुद्धिमान्, वाक्-चतुर, गुरु-भक्ति से युक्त होता है। (6) षष्ठस्थ उपकेतु से मामा के पक्ष को हानि पहुँचाने वाला, शत्रु-नाशक, अनेक बान्धवों वाला, शूरवीर, सुन्दर व तीव्र-बुद्धि होता है। (7) सप्तमस्थ उपकेतु से जुआ-प्रेमी, कामुक, भोगवान्, वेश्याओं से मन लगाने वाला होता है। (8) अष्टमस्थ उपकेतु से नीच-कार्य करने वाला, पापी, निर्लज्ज, निन्दा करने वाला, स्त्री-सुख से रहित, शत्रु-पीडित होता है। (9) नवमस्थ उपकेतु हो तो किसी धार्मिक सम्प्रदाय के चिह्न को धारण करने वाला (जैसे वैष्णव रहने पर तुलसी की माला या पीला तिलक, इत्यादि), प्रसन्न-मन वाला, सब प्राणियों का भला चाहने वाला, धर्म-कार्यों में कुशल होता है। (10) दशमस्थ उपकेतु से सुख-सौभाग्य से युक्त, स्त्रियों का प्रिय, दान देने वाला, द्विजों से घिरा रहने वाला होता है। (11) एकादशस्थ उपकेतु से सदैव लाभ कमाने वाला, सद्धर्म का पालन करने वाला, पूजित, धनी, भाग्यशाली, शूरवीर, यज्ञ करने वाला, विद्वान् होता है। (12) द्वादशस्थ उपकेतु से पाप-कार्य करने वाला, श्रद्धा-हीन, निर्दय, परस्त्री में लगा हुआ होता है।
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