There will be physical distress if Rahu be in the 2nd or the 7th from the Ascendant. The remedial measures to obtain relief from the above evil effects are Mrityunjaya Japa and giving a goat in charity.
दायेशाद् रन्ध्रभावे वा व्यये वा पापसंयुते । घौरादिव्रणभीतिश्च राजवैषम्यमेव च ।।75।। गृहे कर्मकलापेन व्याकुलो भवति धुवम् । सोदरेण विरोधः स्यात् दायादजनविग्रहः ।।76।। गृहे त्वशुभकार्याणि दुःस्वप्नादि भयं धुवम् । अकस्मात्कलहश्चैव क्ुद्रशून्यादिरोगकृत् ।।77।। दिसप्तमस्थिते राहौ देहबाधां विनिर्दिशेत् । तददोषपरिहारार्थः मृत्युंजय जपं चरेत् ।।78।। छागदानं प्रकुर्वीत देवपूजां च कारयेत् । राहुवुष्ट्या - तदा विप्र ! सर्वसौख्यमवाप्नुयात् ।।79।। यदि. महादशेश से 8.12 में राहु हो, पाप युक्त हो तो चोर, चोट सर्पादि का मय, राजा से प्रतिकूलता, घरेलू. समस्या, भायां व उत्तराधिकारियों से विवाद, लोगों का विरोध, घर में अमंगलकार्य, छोटे या काल्पनिक रोगां से पीडा होती हे। यदि राहु 2.7 भाव मेँ स्थित हो तो शरीर कष्ट होता है । इनकी शान्ति के लिए. मृत्युंजय जप, बकरे का दान, देवताओं की पूजा करनी चाहिए । तब जातक राहु की प्रसन्नता सं सब सुख पाता है।
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