Bṛhat Parāśara Horā Śāstra
Chapter 24 · atha bhāveśaphalādhyāyaḥ · अथ भावेशफलाध्यायः · Verse 89
Sanskrit · DevanāgarīBṛhat Parāśara Horā Śāstra manuscript tradition
रन्ध्रेशे सुतभावस्थे जडबुद्धिः प्रजायते ।
स्वल्पप्रज्ञो भवेज्जतो दीर्घायुश्च धनान्वितः
IAST Transliteration
randhreśe sutabhāvasthe jaḍabuddhiḥ prajāyate | svalpaprajño bhavejjato dīrghāyuśca dhanānvitaḥ
TranslationsTwo-source verified
English

If the 8th lord is in the 5th, the native will be dull-witted, will have limited number of children, be longlived and wealthy.

Hindi

अष्टमेश का द्वादशभाव-फल: (1) अष्टमेश लग्न में हो तो शरीर के सुख में कमी, देवताओं की निन्दा करने का स्वभाव, सदैव शरीर पर घाव लगने के योग होते हैं। (2) धन-भाव में अष्टमेश हो तो मनुष्य अपने बाहु-बल से रहित, कम धनी तथा डूबते धन वाला होता है। उसका गया धन प्रायः नहीं लौटता है। (3) तृतीय में अष्टमेश हो तो भाई का सुख नहीं होता। वह आलसी, सेवकों से रहित, तथा बल-हीन होता है। (4) चतुर्थ में अष्टमेश हो तो मनुष्य माता से रहित, घर-भूमि व जायदाद के सुख से वंचित, मित्र-द्रोही होता है। (5) अष्टमेश पञ्चम में हो तो जड-बुद्धि, कम-प्रज्ञा वाला, धनी व दीर्घायु होता है। (6) षष्ठ में अष्टमेश हो तो मनुष्य शत्रुओं को जीतने वाला, दबंग, रोगी, सर्प व जल से घात पाने वाला होता है। (7) अष्टमेश सप्तम में हो तो उसकी दो पत्नियाँ होती हैं। उसे व्यापार में हानि होती है। यदि वह अष्टमेश पाप-युक्त हो तो विशेष हानि होती है। (8) अष्टमेश अष्टम में ही हो तो मनुष्य दीर्घायु, जुआ खेलने वाला, चोर या व्यर्थ बोलने वाला, पापी या गुरुओं की निन्दा करने वाला होता है। (9) यदि अष्टमेश नवम स्थान में हो तो महापापी, नास्तिक, दुष्ट-पत्नी वाला तथा दूसरों का धन लेने वाला होता है। (10) अष्टमेश दशम में हो तो पिता के सुख से रहित, चुगलखोर, कर्म-हीन होता है, यदि वह शुभ-युक्त-दृष्ट हो तो उक्त फल कम होता है। (11) अष्टमेश एकादश स्थान में हो तथा वह पाप-युक्त हो तो विशेषतया निर्धन, बचपन में दुःखी, बाद में सुखी व दीर्घायु होता है। शुभ-युक्त होने पर अशुभ फल में कमी होती है। (12) अष्टमेश व्यय-भाव में हो तो कुकार्यों में व्यय करने वाला, अल्पायु होता है। पाप-युक्त होने पर यह फल अधिक होता है।

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