If the 4th lord is in the 7th, the native will be endowed with a high degree of education, will sacrifice his patrimony and be akin to the dumb in an assembly.
चतुर्थेश का द्वादशभाव-फल: (1) सुखेश (चतुर्थेश) लग्न में हो तो मानव विद्यावान्, गुणी, जमीन-जायदाद वाला, वाहनयुक्त, माता का सुख पाने वाला होता है। (2) द्वितीयस्थ चतुर्थेश से मनुष्य भोग भोगने वाला, सब प्रकार के धनों (पुत्र-धन, यशो-धन, सुख-धन, संचित-धन, पशु-धन, वाहन, भूमि-धन आदि), कुटुम्ब वाला, मानवान्, साहसी, लेकिन मायावी या दिखावा करने वाला होता है। (3) तृतीयस्थ चतुर्थेश से मनुष्य पराक्रमी, नौकर-चाकरों वाला, उदार, गुणवान्, दाता, धनी, लेकिन सदैव किसी न किसी रोग से पीडित रहता है। (4) चतुर्थ में चतुर्थेश हो तो मनुष्य मानी, सब धन से युक्त, चतुर, चरित्रवान्, अच्छा सलाहकार, ज्ञानी व सुखी होता है। (5-9) चतुर्थेश 5.9 में हो तो सुखी, लोकप्रिय, देवताओं में भक्ति रखने वाला, स्वाभिमानी, अच्छे गुणों व धन से युक्त होता है। (मिश्रजी 5 व 9 भावों को एक ही श्लोक 38 में निबद्ध करते हैं; कोरस इन्हें v.41 तथा v.45 के रूप में पृथक् देता है।) (6) चतुर्थेश षष्ठ में हो तो माता के सुख से रहित, क्रोधी, चोर, तान्त्रिक, दूषित क्रियाएँ (मारणादि) करने वाला, स्वेच्छाचारी व दुर्विचार वाला होता है। (7) चतुर्थेश सप्तम में हो तो मनुष्य बहुत विद्यावान्, पिता के धन का स्वेच्छा से त्याग करने वाला, सभा में बहुत कम बोलने वाला होता है। (8-12) चतुर्थेश 8.12 में हो तो मनुष्य घर अर्थात् आवास के सुख से रहित होता है। माता-पिता का कम सुख पाने वाला तथा रति-क्रिया में निर्बल होता है। (मिश्रजी 8 व 12 भावों को एक ही श्लोक 41 में निबद्ध करते हैं; कोरस इन्हें v.44 तथा v.48 के रूप में पृथक् देता है।) (10) चतुर्थेश दशम भाव में हो तो मनुष्य राजमान्य, सुखी, रसायन (कायाकल्प की विशेष पुष्टिकारक दवा) जानने वाला अथवा रसायन से सदैव जवान रहने वाला, बहुत प्रसन्नचित्त, भोगवान् लेकिन जितेन्द्रिय होता है। (11) चतुर्थेश यदि एकादश स्थान में हो तो मनुष्य सदैव रोग के भय से पीडित, उदार, गुणवान्, गुणज्ञ, दानी तथा स्व-परिश्रम से धनी होता है। (मिश्रजी का 10-श्लोकीय पाठ कोरस के 12-श्लोक-ग्रिड को आन्तरिक प्रोस-समूहीकरण से कवर करता है — 5+9 तथा 8+12 ये चार कोरस-स्थितियाँ मिश्र के 2 श्लोकों में निबद्ध।)
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