If the 3rd lord is in the 7th, the native will be interested in serving the king and be not happy during boyhood but at the end of his life.
तृतीयेश का द्वादशभाव-फल: (1) लग्नस्थ तृतीयेश से मनुष्य अपनी शक्ति से धन कमाने वाला, सेवा-चतुर, साहसी, विद्याहीन होते हुए भी बुद्धिमान् होता है। (2) द्वितीयस्थ तृतीयेश से मनुष्य गुदा-मेथुन करने वाला, मोटा, छोटी शुरूआत करने वाला, सुख से रहित, दूसरों की नारी व धन की कामना करने वाला होता है। (3) तृतीयस्थ तृतीयेश से भाई-पुत्रादि से संयुक्त, धनी, प्रसन्नचित्त, विविध सुखों को भोगने वाला होता है। (यहाँ 'भुनक्ति' शब्द को आर्ष प्रयोग मानना चाहिए, अन्यथा 'भुङ्क्ते' पाठ ठीक था।) (4-5-10) यदि तृतीयेश 4.5.10 भाव में हो तो मनुष्य सुखी, धनी, बुद्धिमान्, पुत्रवान् लेकिन क्रूर स्त्री वाला होता है। (मिश्रजी इन तीन भावस्थितियों को एक ही श्लोक 28 में बाँधते हैं; कोरस इन्हें तीन पृथक् श्लोक v.28-29-34 के रूप में देता है।) (6) षष्ठस्थ तृतीयेश से भाइयों से वैर, महाधनी, मामाओं से शत्रुता व मामी से प्यार रहता है। (7-8) तृतीयेश 7.8 में हो तो मनुष्य राजकीय सेवा करने वाला, राजसेवा में ही मरने वाला, दास, बचपन में सुखी या चोर होता है। (कोरस-स्केलेटन में ये पृथक् श्लोक v.31-32; मिश्रजी ने 7-8 दोनों को श्लोक 30 में मिला दिया।) (9) नवमस्थ तृतीयेश से पिता के सुख से रहित, स्त्री के कारण भाग्योदय पाने वाला, पुत्रादि के सुख से युक्त होता है। (11) तृतीयेश एकादश भाव में हो तो व्यापार में सदा लाभ कमाने वाला, कम पढ़ा-लिखा होते हुए भी बुद्धिमान्, साहसी व परायों के काम आने वाला होता है। (12) व्ययस्थ तृतीयेश से कुकार्यों में धन व्यय करने वाला, क्रूर पिता का पुत्र तथा स्त्री के कारण भाग्योदयी होता है। (मिश्रजी का 9-श्लोकीय पाठ कोरस के 12-श्लोकीय ग्रिड को आन्तरिक प्रोस-समूहीकरण से कवर करता है — 4.5.10 तथा 7.8 ये पाँच कोरस-स्थितियाँ मिश्र के 2 श्लोकों में निबद्ध।)
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