Bṛhat Parāśara Horā Śāstra
Chapter 24 · atha bhāveśaphalādhyāyaḥ · अथ भावेशफलाध्यायः · Verse 147
Sanskrit · DevanāgarīBṛhat Parāśara Horā Śāstra manuscript tradition
विभिन्नयोस्तु फलयोर्द्वयोः प्राप्तिर्भवेद्ध्रुवम् ।
ग्रहे पूर्णबले पुर्णमर्धमर्धबले फलम्
IAST Transliteration
vibhinnayostu phalayordvayoḥ prāptirbhaveddhruvam | grahe pūrṇabale purṇamardhamardhabale phalam
TranslationsTwo-source verified
English

MISCELLANEOUS: O Brahmin, those are the effects of house lords which are to be deduced considering their strengths and weaknesses. In the case of a planet owning two bhāvas, the results are to be deduced based on its two lordships (for the same placement). If contrary results are thus indicated, the results will be nullified, while results of varied nature will come to pass. The planet will yield full, half or a quarter of the effects according to its strength being full, medium and negligible respectively. Thus I have told you about the effects due to bhāva lords in various bhāvas.

Hindi

भावफल में तारतम्य (समापन-सिद्धान्त): (श्लोक 145 = मिश्र 104) इस प्रकार मैंने (पराशर) भावेशों का जो फल कहा है, उसकी प्राप्ति बलाबल के आधार पर कहनी चाहिए। (श्लोक 146 = मिश्र 105) यदि कोई ग्रह दो राशियों का स्वामी हो (द्विराशीश ग्रह) तो उसके दोनों भावों के अनुसार फल जानकर निश्चय करना चाहिए। यदि दोनों प्रकार से विरोधी फल मिलें तो दोनों ही फलों का नाश हो जाता है। (श्लोक 147 = मिश्र 106) यदि दोनों प्रकार से फल अलग-अलग आएँ तो वह शुभ-अशुभ जैसा भी हो, उन दोनों ही फलों की प्राप्ति होती है। यदि ग्रह पूर्ण-बली हो तो उसका भाव-फल पूरा तथा आधा बली होने पर आधा ही फल मिलता है। (श्लोक 148 = मिश्र 107) यदि ग्रह अल्प-बली हो तो चौथाई फल समझना चाहिए तथा निर्बल ग्रह का फल शुभ-अशुभ जैसा भी हो, वह नहीं मिलता। इस प्रकार भावेश की भिन्न भाव-स्थितियों के अनुसार फल कहना चाहिए। (मिश्रजी का प्रयोग-उदाहरण: हमारे क्रमिक उदाहरण-कुण्डली में बृहस्पति 6.9 भावेश होकर द्वितीय में है तथा मंगल 5.10 भावेश होकर पञ्चम में है। षष्ठेश द्वितीय में हो तो मनुष्य साहसी, कुल-मुख्य, परदेशी, सुखी तथा कार्य-मग्न होता है; नवमेश द्वितीय में हो तो मनुष्य पण्डित, जन-प्रिय, धनी, सुखी होता है। इन फलों में 'धनी-सुखी' सामान्य फल है — कोई विरोध नहीं — अतः यह फल मिलेगा। इसी तरह पञ्चमेश पञ्चम में रहने पर पाप-युक्त रहने से सन्तान-हीन तथा दशमेश पञ्चम में होने से पुत्रवान्‌-धनी — अतः सन्तान की सामान्य संख्या होती है। वराहमिहिर ने इस सिद्धान्त का समर्थन बृहज्जातक दशान्तर्दशा 23 में भी किया है — एक ग्रह किसी विधि से धनप्रद तथा अन्य-विधि से धन-नाशक हो तो न धन-लाभ न धन-हानि, कुष्ठ भी नहीं होती; अधिक बली होने पर अधिक फल की प्राप्ति।)

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